Wednesday, June 21, 2017

जज़्बात, एक तो थोड़े biased हैं,
और दर्द भी बहुत bully करता है,
तो हंसी बेचारी,.. सिर्फ़ और सिर्फ़ .. 
भीड़ के इकट्ठा होने पर ही,
निकलती है ..आजकल। 
अकेले में पाकर,
इतनी ज़ोर से गला घोंटता है,
खुशियों का,..  ये सूनापन,
कि चीखें भी नहीं आतीं,
और दिल रोता भी रहता है,
रात भर,
.... पर सिर्फ़ अकेले में,
और ये जज़्बात कुछ नहीं कहते,
हंसी पड़ी रहती है, 
और,...  आदमी रोता रहता है। 


-प्रणव मिश्र 


Sunday, June 4, 2017

ये पिछली generation ने,
काम पूरा नहीं किया सही से,
बात करना सिखा दिया,
चुप रहना नहीं सिखाया,
हगना सिखा दिया,
कितना धोना है,
... नहीं सिखाया,
तभी, जब भी,
आदमी के इर्द-गिर्द होता हूँ,
वो सिर्फ़ टट्टी करता है,
मुँह बन्द करके तो करता ही है,
.. पीठ पीछे,
सामने मुँह खोल के करता है,
and ..
everyone is okay with it.


-प्रणव मिश्र 

Tuesday, May 16, 2017

सुबह से देख रहा हूँ
ये पहाड़ वहीँ का वहीँ खड़ा है,
ठीक मेरे सामने,
न वो हट रहा है, न मैं उठ रहा हूँ .....
..पर, इस वक़्त जहाँ तुम हो,
और इसे पढ़ रहे हो,
तुम्हे नहीं समझ आएगा, यहाँ क्या हो रहा है,
और ...अगर तुम यहाँ होते भी,
तो क्या उखाड़ लेते?
ये पहाड़ यहीं का यहीं खड़ा होता ठीक मेरे सामने,
न मैं हटता, न वो उठता,
और तुम निकल जाते,
किसी cafe में जाकर,
किसी पहाड़ी chicken की बोटियाँ चाटने...


-प्रणव मिश्र
हर एक शब्द,
कितना गहरा हो जाता है,
और बदल जाते हैं उनके मायने,
और एक-एक करके कई सारे शब्द,
delete हो जाते हैं,
कि उनके मायने अब तक़लीफ़ देते हैं,
और फिर बात करना इतना मुश्किल हो जाता है,
कि सिर्फ़ yes, no, it's ok,yeah, hmm, cool...
में सारी बातें हो जाती हैं,
..
दर्द होता है,
तो अब कह नहीं सकते,
कि फिर, और दर्द होता है,
देखो अनसुना कर दिया,
फिर भी,
आदमी कोशिश करता है,
घिसता रहता है,
सीलन में भीगी किसी माचिस की तिल्लियों की तरह,
... रिश्तों को,
न जाने कौन सी जल जाये,
न जाने किस कोने में कोई आग बची हो। 


-प्रणव मिश्र


Sunday, April 30, 2017

जब.. कई दिनों तक,
पेट ख़राब हो,... तो
टट्टी करने में मज़ा नहीं आता,
पेट पकड़ कर कितनी ही देर बैठते हैं हम, pot पे,
टट्टी आती नहीं,
पर... आंतें दर्द ज़रूर करती हैं,
कई cases में पेट भी ठीक हो जाता है,
और टट्टी भी आती है,
पर आंतें इतना सूज जाती हैं तक़लीफ़ में,
कि मज़ा नहीं आता।
ठीक इसी तरह लगता है,
३२ सालों तक किसी न किसी के बार-बार आने,
और बार-बार जाने के बाद,
धड़कनें सूज जाती हैं,
और फेफड़ों में fit नहीं होतीं,
बड़ी ज़ोर से खटखटाती रहती हैं,
सीने के पीछे से रात भर,
पर निकल नहीं पातीं, तो...
आदमी जो न पीता है, न फूंकता है,
कुछ देर को meditative music लगाता है,
फिर नींद तो आ जाती है,
पर मज़ा बिलकुल नहीं आता।


-प्रणव मिश्र 

Tuesday, April 25, 2017

कैसे कोई देखे,
मेरे अन्दर बसी तुम्हारी परछाइयों को,
बस तुम नाम हो उनके लिए,
जो मैं लेता नहीं,
तुम्हारे होठों की वो खुश्क दरारें,
आज भी याद हैं मुझे,
सर्दियों की रात थी,
और सूख गए थे शायद,
कैसे कोई रोके,
मुझे अब,..  तुमसे दूर होके,
ख़याल मिल आते हैं,
अकेले में तुमसे,
कैसे कोई फूके,
जान,.. अब,
जब कितना कुछ कहता हूँ दिन रात,
पर कोई समझता नहीं,
कैसे?... कोई तो होगा,
तरीका कि एक बार,
फिर से हो सामने तुम,...,
और मैं गीला करूँ तुम्हरे सूखे होठों को,
अपनी बात कहते हुए। 



-प्रणव मिश्र