Tuesday, October 22, 2013

क्यूँ?

मंदिर के उस guard ने,
आज हाथ नहीं हिलाया,
बस थोड़ा  मुस्कराया,
और सीढ़ियों पर जा कर बैठ गया,
मैं,
जा कर खड़ा हो गया,
कई बिछी लाशों के बीच,
कई माओं ने,
आज अपना बेटा  खोया था,
कई बच्चे अनाथ हुए थे,
कई बेहाल थे, 
सीढ़ियों से ठीक ऊपर एक gate था,
जिसके निचली तरफ़ ,
जहाँ मकड़ियों का जाला था,
कई उसमे जकड़े थे,
कई ठीक उस gate के ऊपर लगे bulb से अब भी 
जूझ रहे थे,
bulb ही तो है,
छोड़ क्यूँ नहीं देते,
तुम हटोगे ,
तो शायद,
ये रस्ता, और भी रौशन होगा,
… 
मैन्दिर के उस guard  ने,
अपनी चप्पल से कुछ 
जले,
पड़े,
मरे,
पतिंगों को हटाया,
तो मैं  जूते पहनने के लिए बैठ पाया,
फिर,
वो मुस्कराया,
हाथ फिर भी न हिलाया,
उसी shawl में जकड़ा,
वो पतिंगे ,
उसी जाले  में जकड़े ,
मेरे मन में october की उस शाम,
बस एक ही सवाल था.…


ठण्ड से पहले ठण्ड क्यूँ लगती है,
मौत से पहले, लोग मरते हैं क्यूँ?



2 comments:

  1. i like to read about people and rarely read what they write...
    but sir, u blog holds me tight... i cannot stop me "ठण्ड से पहले ठण्ड क्यूँ लगती है,
    मौत से पहले, लोग मरते हैं क्यूँ?"

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