Saturday, October 19, 2013

ये प्याले चाय के कभी तो जाके साफ़ होंगे।

ये ज़िन्दगी ख़त्म कब होगी?
ये साँसे कब रुकेंगी?
ये प्याले चाय के कभी तो जाके साफ़ होंगे।

ये रात कब कटेगी?
सुबह भी सोचता होगा,
ये प्याले चाय के कभी तो जाके साफ़ होंगे।

कभी तो जाके,
हवा भी,
ये साँसे रोक लेगी,
साँसे रुकेंगी,
दिल रुकेगा,
दम भी रुकेगा,
कुछ देर चिता पे मेरी,
तुम भी रुकोगे,
चित रुकेगा,
रुक रुकेगा,
रुक्का रुकेगा,
ख़ामोशियों का सिलसिला,
ग़म भी रुकेगा,
मैं साथ साथ मेरा,
अहम् भी रुकेगा,
जो नींद की तलाश में
बैठा हूँ तबसे,
मन भी रुकेगा,
और मंदिर भी रुकेगा,
बस एक ही ख़याल,
जो रुकता नहीं अब…


ये प्याले चाय के कभी तो जाके साफ़ होंगे। 


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