Saturday, December 28, 2013

सुबह तक!

कागज़ के कुछ पन्ने ,
और मेरा computer ,
आज कल इसी चर्चा में हैं,
कि मैं प्यार किसे करता हूँ,
वो pencil जो कभी हाथ की उँगलियों से,
सोते वक़्त भी चिपकी रहती थी,
आज बस उस सफ़ेद कप से चेहरा निकाल  कर झाँका करती है,
मैं हर चार दिन में उसे facial देता हूँ,
और वो हर चार दिन में चार बीता छोटी हो जाती है,
कागज़ के वो पन्ने और वो pencil अब बस शाम तक,
कंप्यूटर से मुझे बातें करते हुए देखते रहते हैं,
और फिर रात भर कप के भीतर बैठ वो पेंसिल,
पुराने दिनों को याद कर ठण्ड में बिना चादर के बाहर सो रहे पन्नों को,
जगाती रहती है,
सुबह तक!


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