Thursday, March 23, 2017

तुम्हारी बातें आज कल,
समय ही नहीं देतीं,
कि लिखूं कुछ,
और,.. 
लोग पूछते रहते हैं,
मिश्रा, नया क्या लिखा? 
अब तुम ही बताओ,
तुम्हारी आँखों में देखूं, एक तकिये पर सर रख कर,
या लिखूं, कि देखा उस रात, देखो तुम्हारी आँखों में। 
पागल कर देती हो,
जब फुदकती हो इर्द गिर्द 
दिमाग काम नहीं करता,
और नसों में सिर्फ़ तुम दौड़ती हो,
फिर न पढ़े तो न सही कोई,
कूड़े में गयीं कविताएँ,
और कैसे लिखूं कुछ भी नया 
मेरा material भी सारा ख़र्च हो जाता है, आज कल,
सिर्फ़ तुमसे बात करने में। 

-प्रणव मिश्र 


No comments:

Post a Comment