Wednesday, April 5, 2017

तुम्हे इस कदर scan कर चूका हूँ,
कि तुमसे ज़्यादा पहचानने लगा हूँ,
अब,....  तुमको मैं।
ये सोते वक़्त,
कैसे हिलते हैं
होठ तुम्हारे,
पता है?
थिरकते हैं, rhythm में,
और कितनी ही बार,
उनको मैंने सुलाया है,
अपने होठों से कहानी सुना कर,
सुबह के चार बजे।

और ये नींद में जो करवट बदल कर,
सर रख देती हो छाती पे मेरे,
उसे continue रखो,
कहता नहीं हूँ,
पर बहुत अच्छा लगता है।

-प्रणव मिश्र




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